..
..just some catecholamines acting and reacting.... Diary of a responding self.. Nothing so personal :)
Thursday, January 30, 2014
Monday, January 20, 2014
रिश्तों के मेषर्मेंट
आज
शिवि से बात करते हुए....शिवि.. मेरी बहुत ही प्यारी सी दोस्त, एक चीज़
रीयलाइज़ हुई... की कॉन्फिडेन्स होने या दिलाने के लिए चीज़ों का पुख़्ता
होना ज़रूरी नही है !
हमें मिले हुए 3.5 साल हो गये अभी..कभी कभी महीनों बाद बात करते हैं...मगर हर बार ऐसे ही जैसे बस कल रात ही बात हुई हो...बात करते समय अक्सर वो कह देती है "तुझे तो पता ही है मेरा...".. और सच में कभी कभी मुझे पता नही होता... कभी कभी शायद मैं उस आइडिया से अन्भिग्य होती हूँ.. मगर वो एक मोमेंट का कॉन्फिडेन्स जब वो दिखाती है मुझमें...मुझे ऐसा नहीं लगता की मैं उसे मना कर दूं... बल्कि मैं उस आइडिया को और ज़्यादा रिलेट करने लगती हूँ आज से कल से बातों से... और उसके कॉन्फिडेन्स को पुख़्ता करती हूँ... पर इसमें एक बात समझ आती है..... कभी कभी वो एक मोमेंट का कॉन्फिडेन्स आपको किसी के साथ बस जोड़ देता है... शायद उसे भी पता हैं श्रेया ये नहीं जानती मेरे बारे में मगर कोई कॉन्फिडेन्स है उसको की वो बस बोल देती है "तू तो जानती ही हैं ना..."... शायद उसको भी पता है कि ये समझ जाएगी....
कभी कभी पुख़्ता करना ज़रूरी नही... बस भरोसा ही करना होता है.... पर शायद उसके पीछे भी कोई ज़मीन तो रही होगी.... शायद व्यापार ही है रिश्ता भी कि आप एक ज़मीन के दायरे में भावनायो का लेना देना करते हो.... पर ये व्यापार भी अपने में ही खरा है...... एक अपना ऑटोमॅटिक सा फिल्टर सिस्टम है इसका जो आपको समझा देता है कि आपको ये आदान प्रदान करना भी किस खरीदार के साथ है.....ठीक है ना एक आध जगह कभी चूक हो भी जाती होगी...अब हर शह तो सिक्स सिग्मा सर्टिफाइड नही होती.... पर फिल्टर होते होते बस वही कुछ खरीदार बच जाते हैं ....आपकी भावनायो के रेग्युलर कस्टमर बन जाते हैं जो आपके फिल्टर सिस्टम से बिना पुष्टि के .... आपकी ज़ुबान के भरोसे पे रिश्ता पुख़्ता किए जाते हैं.... बाकी तो बस कॅल्क्युलेशन ही है वक़्त की .... विसिनिटी की ..... पर्सेप्षन्स की !!
हमें मिले हुए 3.5 साल हो गये अभी..कभी कभी महीनों बाद बात करते हैं...मगर हर बार ऐसे ही जैसे बस कल रात ही बात हुई हो...बात करते समय अक्सर वो कह देती है "तुझे तो पता ही है मेरा...".. और सच में कभी कभी मुझे पता नही होता... कभी कभी शायद मैं उस आइडिया से अन्भिग्य होती हूँ.. मगर वो एक मोमेंट का कॉन्फिडेन्स जब वो दिखाती है मुझमें...मुझे ऐसा नहीं लगता की मैं उसे मना कर दूं... बल्कि मैं उस आइडिया को और ज़्यादा रिलेट करने लगती हूँ आज से कल से बातों से... और उसके कॉन्फिडेन्स को पुख़्ता करती हूँ... पर इसमें एक बात समझ आती है..... कभी कभी वो एक मोमेंट का कॉन्फिडेन्स आपको किसी के साथ बस जोड़ देता है... शायद उसे भी पता हैं श्रेया ये नहीं जानती मेरे बारे में मगर कोई कॉन्फिडेन्स है उसको की वो बस बोल देती है "तू तो जानती ही हैं ना..."... शायद उसको भी पता है कि ये समझ जाएगी....
कभी कभी पुख़्ता करना ज़रूरी नही... बस भरोसा ही करना होता है.... पर शायद उसके पीछे भी कोई ज़मीन तो रही होगी.... शायद व्यापार ही है रिश्ता भी कि आप एक ज़मीन के दायरे में भावनायो का लेना देना करते हो.... पर ये व्यापार भी अपने में ही खरा है...... एक अपना ऑटोमॅटिक सा फिल्टर सिस्टम है इसका जो आपको समझा देता है कि आपको ये आदान प्रदान करना भी किस खरीदार के साथ है.....ठीक है ना एक आध जगह कभी चूक हो भी जाती होगी...अब हर शह तो सिक्स सिग्मा सर्टिफाइड नही होती.... पर फिल्टर होते होते बस वही कुछ खरीदार बच जाते हैं ....आपकी भावनायो के रेग्युलर कस्टमर बन जाते हैं जो आपके फिल्टर सिस्टम से बिना पुष्टि के .... आपकी ज़ुबान के भरोसे पे रिश्ता पुख़्ता किए जाते हैं.... बाकी तो बस कॅल्क्युलेशन ही है वक़्त की .... विसिनिटी की ..... पर्सेप्षन्स की !!
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